आपकी समस्त विद्वत्ता, आपका शेक्सपियर और वड्सवर्थ का संपूर्ण अध्ययन निरर्थक है यदि आप अपने चरित्र का निर्माण व विचारों क्रियाओं में सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाते। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ३७६)
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