चाणक्य कौटिल्य: चित्तैकाग्रता (अधिकरुद्धचिः) व्यक्ति कार्य सिद्ध नहीं कर पाता ।

चित्तैकाग्रता (अधिकरुद्धचिः) व्यक्ति कार्य सिद्ध नहीं कर पाता । — चाणक्य कौटिल्य

चित्तैकाग्रता (अधिकरुद्धचिः) व्यक्ति कार्य सिद्ध नहीं कर पाता ।

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