चाणक्य कौटिल्य: वाणी की कठोरता आग की ज्वलन्त से भी अधिक कष्टकर है ।

वाणी की कठोरता आग की ज्वलन्त से भी अधिक कष्टकर है । — चाणक्य कौटिल्य

वाणी की कठोरता आग की ज्वलन्त से भी अधिक कष्टकर है ।

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